rediff ILAND
Welcome Guest, | Create your own iLand| Sign In  | New User? Get Started
Home
iLand
Blogs
Friends/Contributors
Guestbook  
 
Chandramohan Gupta
Categories
Poetry
What is an RSS feed?
RSS Feed 
mumuksha.rediffiland.com/ 
Recent Posts
 23:29 | 18/Feb/2008 | 0 Comment(s)
Meri Rachanain

  श्रद्धा
  
  (11)

धूं - धूं कर जल रहा ह्रदय
विखंडित प्रेम - ज्वाला से
नित ही भुला रहें इसकी पीड़ा
पी - पी कर विषमय हाला से

क्षण को विस्म्रत भले करे, पर
फिर उभरेगी ज्यों उतरेगी हाला

प्यार तराशा होता यदि श्रद्धा में
हर हाल बचाती पीड़ा- ज्वाला से

Permalink 
 21:57 | 17/Feb/2008 | 0 Comment(s)
Meri Rachanain

    श्रद्धा
   
    (10)

जीवन - दुख को भले भुला दो
कुछ क्षण को , पी कर ये हाला
उतरेगी जब ये, तो विस्म्रत दुख
खूब सताएंगी बन के ज्वाला

एक रमा ले मन में श्रद्धा
जग मे कहलाएगा मतवाला

तन - मन पर क्या कर पाएगी
तब, दुख-द्वेष-क्लेश की ज्वाला

Permalink 
 21:42 | 17/Feb/2008 | 0 Comment(s)
Meri Rachanain

    श्राद्धा

     (9)

मेरे देवालय, तेरे मस्जिद
उनके चर्च , गुरुद्वारे भी यहाँ
अपनों मे ये श्राद्धा भी कैसी
रहते नत - मस्तक सभी यहाँ

कर, बिस्त्रत कर, स्व-श्राद्धा और
भेद-भाव से तब लेगा मुँह मोड़

भुला सभी धर्मों का उपहास
जोड़े मानव से मानव यही यहाँ

Permalink 
 21:26 | 17/Feb/2008 | 0 Comment(s)
Meri Rachanain

 श्राद्धा
 
  (8 )

खंडित ख्वाबों के कण- कण में
दिखी न तनिक व्याकुल रेखाएँ
पर दुखित मानव मन इतना कि
द्रग से झर - झर बह आंसूं आए

मैं, मेरा के भावों से हो ग्रस्त
हुए आज हम विपदाओं से त्रस्त

भूल अहं भावों को तू अब
रम कर श्राद्धा में मस्त हो जाए


Permalink 
 09:32 | 17/Feb/2008 | 0 Comment(s)
Meri Rachanain

श्राद्धा

 (7)


दिंन हुए पूर्ण जब सत्यवान के
आए यमदूत ले जाने की ठान के
कस ली कमर सावित्री ने तत्क्षण
भागे यमदूत निष्फल प्रयास जान के

हार से आहत हुआ यम का अहं
स्त्री से युद्ध को चल पड़ा बेरहम

श्राद्धा - कवच तो रहे अभेद्ध सती के
पर हुए तार - तार यम - मान के

Permalink 
 08:59 | 17/Feb/2008 | 0 Comment(s)
Meri Rachanain

श्राद्धा

 (6)


प्यार लुटाने को हो प्रस्तुत
नहीं छिपा रखने की है वस्तु
डुबा प्रियतम को इसमे इतना
रहे आसक्ति - मदिरा मे सुप्त

भ्रमित नहीं तब हो पाएगा
समस्त अहं उड़न-छू हो जाएगा

श्राद्धा प्रेम - भावों की अपनाकर
नर्क - सा जीवन पाओगे लुप्त

Permalink 
 08:48 | 17/Feb/2008 | 0 Comment(s)
Meri Rachanain

श्राद्धा

  (5)

मन आज हो रहा क्यों अस्थिर
अपने क्यों लग रहे अचिर
मत भरो आज हिंसक हुंकारे
हो स्थिर, सोंचो फिर - फिर

होते हैं खंडित संबंध अहं से
निकलेंगे सारे विद्वेष जहन से

खोकर श्राद्धा - भावों मे ही तू
रहो अछूते दंभ- दहन से, फिर

Permalink 
 17:08 | 16/Feb/2008 | 0 Comment(s)
Meri Rachnain

श्रद्धा

 (4)


गुरु द्रोणाचार्य भले ही हो, पर
शिष्य एकलव्य ही पूज्य अहो
ठुकरा दे गुरु कितना ही, पर
श्राद्धा - भाव न त्याज्य अहो

मानव से पत्थर - मूर्ति भली
श्राद्धा गई न कभी छली

तोड़ मर्यादा गुरु मांगे अंगूठा भी
तत्क्षण देना ही श्राद्धा -अंदाज अहो



Permalink 
 12:44 | 16/Feb/2008 | 0 Comment(s)
Meri Rachnain

श्रद्धा

 (3)


सागर बीच फंसी है नैया
ब्याकुल नहीं तनिक खेवैया
श्राद्धा पूर्ण बसी है पालों में
ये पार करा देगी रहिया

रोने से बेहतर विश्वास भरो
जीवित रहने का अहसास करो

श्राद्धा एक रमा कर मन में
पाएगा बस खुशियाँ ही खुशियाँ

Permalink 
 12:33 | 16/Feb/2008 | 0 Comment(s)
Meri Rachnain

श्राद्धा

  (2)

जन कर श्राद्धा मन में
भरती है स्फूर्ति बदन में
झन्क्रत कर तन - मन को
है प्यार दिखती कण-कण में

पत्थर भी तो हैं देव उसी से
झुकते शीश जंहा खुशी से

बीतेगा जीवन हंसी- खुसी से
बस श्राद्धा एक रमा ले मन में

Permalink