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Meri Rachnain
श्रद्धा
(4)
गुरु द्रोणाचार्य भले ही हो, पर शिष्य एकलव्य ही पूज्य अहो ठुकरा दे गुरु कितना ही, पर श्राद्धा - भाव न त्याज्य अहो
मानव से पत्थर - मूर्ति भली श्राद्धा गई न कभी छली
तोड़ मर्यादा गुरु मांगे अंगूठा भी तत्क्षण देना ही श्राद्धा -अंदाज अहो
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