श्राद्धा (5)मन आज हो रहा क्यों अस्थिर अपने क्यों लग रहे अचिरमत भरो आज हिंसक हुंकारेहो स्थिर, सोंचो फिर - फिरहोते हैं खंडित संबंध अहं सेनिकलेंगे सारे विद्वेष जहन सेखोकर श्राद्धा - भावों मे ही तूरहो अछूते दंभ- दहन से, फिर