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Meri Rachanain
श्रद्धा (11)
धूं - धूं कर जल रहा ह्रदय विखंडित प्रेम - ज्वाला से नित ही भुला रहें इसकी पीड़ा पी - पी कर विषमय हाला से
क्षण को विस्म्रत भले करे, पर फिर उभरेगी ज्यों उतरेगी हाला
प्यार तराशा होता यदि श्रद्धा में हर हाल बचाती पीड़ा- ज्वाला से
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